कई बार सुलझा सा दिखने वाला मन बेहद उलझन में होता है। वो बहुत कुछ कहना चाहता है, सुनना, समझना चाहता है। बस, क्या कहे यही नहीं समझ पाता। एक अजीब अनजाना सा डर हर वक़्त दिमाग को जकड़े रखता है। घबराहट की परत में सुकून कहीं दब सा गया होता है। कभी कभी हँसना बहुत मुश्किल लगता है। आने वाला कल क्या होगा, उसका क्या रूप होगा, क्या परिस्थितियां होंगी.. बस विचार इसी एक विचार के इर्द गिर्द घूमता रहता है। देखने वालों को ये झुंझलाहट और चिड़चिड़ाहट के रूप में दिखता है, और जो इस परिस्थिति में होता है, उसे कोई ऐसा चाहिए होता है जो उसे सुन ले, समझ ले। मानसिक शांति बहुत ज़रूरी है। अगर कोई आपसे '' कुछ नहीं '' कहना चाहता है, तो उसके इस कुछ नहीं को सुनना बहुत ज़रूरी होता है। ज़रूरी नहीं कि आप एक मानसिक रोग विशेषज्ञ ही हों, पर एक इंसान तो हैं न.. बहुत बार सिर्फ़ चुपचाप मौजूद रहना भी बहुत कारगर चिकित्सा साबित होता है। सुनना और सलाह देना दो अलग बातें हैं। सलाह न दे सकने की स्थिति में भी सुनना बहुत काम कर जाता है। आप अगर मौजूद हैं तो अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना ज़रूरी है, हो सकता है किसी की मानसिक स्...