रफ़्तार ने फिर ज़िन्दगी की चाल रोक दी। स्कूल से लौटते वक़्त ऑटो वाले ने एक तरफ इशारा कर के बताया कि दोपहर में यहाँ एक दुर्घटना में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। शाम से ही ये बात दिमाग में घर कर गयी है। हम सब अगली सुबह का इंतज़ार करते हैं। एक नए दिन को नई उम्मीद, नई आस से जोड़ते हैं। घर से निकलते वक़्त शाम को लौट के आने के विश्वास के साथ घर वालों से विदा लेते हैं। और ये हमारी रोज़ की दिनचर्या है, एक बंधा-बंधाया नियम। रोज वही रास्ता, वही मंज़िल, वही सपने और उन सपनों को पूरा करने के लिए नया हौसला। रफ़्तार पकड़ लेते हैं हम, दसों दिशाओं में चौकन्नी नजरें दौड़ती हैं। हर कदम सोच के, समझ के बढ़ाते हैं। पर आज की घटना ने अनायास ही सोचने पर मज़बूर कर दिया, हाँलाकि हर रोज अखबार और टी.वी. की खबरें ऐसी घटनाओं से भरी होती हैं, पर अगर कुछ आँखों के सामने हो तो उसका अलग ही मनोवैज्ञानिक असर होता है। एक विचार ने कई सवाल खड़े कर दिए... घटना हुई, निश्चित रूप से उस समय हर सम्भव प्रयास किया गया होगा। कहीं न कहीं कुछ बुझती हुई उम्मीद होगी उन ज़िंदगियों को बचा लेने की। क्या किसी को दोष देना चाहिए? क्या किसी को सज़ा दे...