रफ़्तार ने फिर ज़िन्दगी की चाल रोक दी।
स्कूल से लौटते वक़्त ऑटो वाले ने एक तरफ इशारा कर के बताया कि दोपहर में यहाँ एक दुर्घटना में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। शाम से ही ये बात दिमाग में घर कर गयी है।
हम सब अगली सुबह का इंतज़ार करते हैं। एक नए दिन को नई उम्मीद, नई आस से जोड़ते हैं। घर से निकलते वक़्त शाम को लौट के आने के विश्वास के साथ घर वालों से विदा लेते हैं। और ये हमारी रोज़ की दिनचर्या है, एक बंधा-बंधाया नियम।
रोज वही रास्ता, वही मंज़िल, वही सपने और उन सपनों को पूरा करने के लिए नया हौसला। रफ़्तार पकड़ लेते हैं हम, दसों दिशाओं में चौकन्नी नजरें दौड़ती हैं। हर कदम सोच के, समझ के बढ़ाते हैं।
पर आज की घटना ने अनायास ही सोचने पर मज़बूर कर दिया, हाँलाकि हर रोज अखबार और टी.वी. की खबरें ऐसी घटनाओं से भरी होती हैं, पर अगर कुछ आँखों के सामने हो तो उसका अलग ही मनोवैज्ञानिक असर होता है।
एक विचार ने कई सवाल खड़े कर दिए... घटना हुई, निश्चित रूप से उस समय हर सम्भव प्रयास किया गया होगा। कहीं न कहीं कुछ बुझती हुई उम्मीद होगी उन ज़िंदगियों को बचा लेने की।
क्या किसी को दोष देना चाहिए? क्या किसी को सज़ा देनी चाहिए? परंतु प्रश्न ये है कि दोष दें किसको...?
वही रास्ता, लगभग हर दिन समय भी एक ही होगा और यात्रा का साधन भी समान।
फिर...!
आज क्या अलग..? क्यों अलग...?
नया सवाल... हमेशा से सुनती आ रही हूँ, जीवन का सबसे बड़ा सच मृत्यु है। फिर जीवन क्या मात्र मृत्यु से साक्षात्कार का जरिया भर है?
जो भी आज देखा मैंने, कुछ दिनों तक उतना ही ताज़ा रहेगा ऑंखों में। पर मेरा रास्ता भी तो वही है! दिन में दो बार उसी रास्ते से गुजरना है। तो क्या मुझे इस डर को अपने भीतर पनपने देना चाहिए?
निश्चित रूप से जवाब 'ना' होगा, होना भी चाहिए। डर कर तो अपने सपने और अपनी मंजिल को हम ख़ुद से ख़ुद ही दूर कर देंगे। पर हाँ, आज इस बात का एहसास हुआ कि जीवन अनिश्चिताओं से भरा हुआ है। आगे का पल हम नहीं जान सकते पर उस को बेहतर बनाने के सपने देखने का हक़ कोई नहीं छीन सकता है।
"हर अगला पल किसी को बहुत कुछ दे जाता है और वहीं कुछ लोगों से बहुत कुछ छीन भी लेता है। पर 'बहुत' और 'सब कुछ' में एक महीन सा अंतर होता है। यही एक अंतर जीवन और मृत्यु के बीच में भी है।"
मृत्यु हमारे हाथ में नहीं, अगला पल हमारे हाथ में नहीं, पर जीवन है, सपने देखने का अधिकार है, खुश व दुःखी होने का भाव है।
आज यही सीखा, डर भी एक हद तक जरूरी, ख़ुद की अहमियत समझ आ जाती है। प्रभावित होना या न होना एक बात है और उस प्रभाव को स्वयं पर हावी होने देना पूरी तरह से अलग मसला।
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