कई बार सुलझा सा दिखने वाला मन बेहद उलझन में होता है। वो बहुत कुछ कहना चाहता है, सुनना, समझना चाहता है। बस, क्या कहे यही नहीं समझ पाता। एक अजीब अनजाना सा डर हर वक़्त दिमाग को जकड़े रखता है। घबराहट की परत में सुकून कहीं दब सा गया होता है। कभी कभी हँसना बहुत मुश्किल लगता है। आने वाला कल क्या होगा, उसका क्या रूप होगा, क्या परिस्थितियां होंगी.. बस विचार इसी एक विचार के इर्द गिर्द घूमता रहता है। देखने वालों को ये झुंझलाहट और चिड़चिड़ाहट के रूप में दिखता है, और जो इस परिस्थिति में होता है, उसे कोई ऐसा चाहिए होता है जो उसे सुन ले, समझ ले। मानसिक शांति बहुत ज़रूरी है। अगर कोई आपसे '' कुछ नहीं '' कहना चाहता है, तो उसके इस कुछ नहीं को सुनना बहुत ज़रूरी होता है। ज़रूरी नहीं कि आप एक मानसिक रोग विशेषज्ञ ही हों, पर एक इंसान तो हैं न.. बहुत बार सिर्फ़ चुपचाप मौजूद रहना भी बहुत कारगर चिकित्सा साबित होता है। सुनना और सलाह देना दो अलग बातें हैं। सलाह न दे सकने की स्थिति में भी सुनना बहुत काम कर जाता है। आप अगर मौजूद हैं तो अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना ज़रूरी है, हो सकता है किसी की मानसिक स्...
ये जागती हुई रातें भी अजीब होती हैं। कितना कुछ होता है इनके पास कहने को, अगर हम तैयार हों उन्हें सुनने के लिए। चारों तरफ फैली सन्नाटे की चादर ख़ामोशी से एक कहानी बुनती है और किरदार.. हम ही तो होते हैं। हमारा वो हिस्सा जो दिन के उजाले में धुंधलाया सा रहता है। जिसे कभी हम छिपाने की कोशिश करते हैं और कभी चाहते हैं सब उस हिस्से से रूबरू हो जाएं। सच तो ये भी है कि अपने उस हिस्से को हम ख़ुद से भी छिपा कर रखते हैं। ये रात ही तो जागती है हमारे साथ, दिन की तरह हमें हज़ार मुखौटों का सहारा नहीं लेना पड़ता। ख़ुद से मुलाक़ात, कही-अनकही हर एक बात, ख़ुद के साथ मुस्कुराना फ़िर ख़ुद से ही रूठ जाना, एक ये रात ही तो है जो समय नहीं देखती, जिसकी घड़ी नहीं भागती। ये हमारा इंतज़ार करती है। ये अँधेरे जो बेहद काले हैं, अजीब रोशनी से भरे होते हैं, ऐसी रोशनी जिसमें हमारा अक्स दमकता है। ये अंधेरे की रोशनी, ये उजाला, जो बहुत शानदार है, जिसके पास जाने कितने रंग हैं, जिनमें हम सराबोर हो जाना चाहते हैं। बोलो, दिन में कभी देखी है ये रोशनी? नहीं न.. अरे ये दिन के उजाले छलावा करते हैं। डरते हैं ये कहीं हम हम न हो जाएं, कहीं ह...