ये जागती हुई रातें भी अजीब होती हैं। कितना कुछ होता है इनके पास कहने को, अगर हम तैयार हों उन्हें सुनने के लिए। चारों तरफ फैली सन्नाटे की चादर ख़ामोशी से एक कहानी बुनती है और किरदार.. हम ही तो होते हैं। हमारा वो हिस्सा जो दिन के उजाले में धुंधलाया सा रहता है। जिसे कभी हम छिपाने की कोशिश करते हैं और कभी चाहते हैं सब उस हिस्से से रूबरू हो जाएं। सच तो ये भी है कि अपने उस हिस्से को हम ख़ुद से भी छिपा कर रखते हैं।
ये रात ही तो जागती है हमारे साथ, दिन की तरह हमें हज़ार मुखौटों का सहारा नहीं लेना पड़ता। ख़ुद से मुलाक़ात, कही-अनकही हर एक बात, ख़ुद के साथ मुस्कुराना फ़िर ख़ुद से ही रूठ जाना, एक ये रात ही तो है जो समय नहीं देखती, जिसकी घड़ी नहीं भागती। ये हमारा इंतज़ार करती है।
ये अँधेरे जो बेहद काले हैं, अजीब रोशनी से भरे होते हैं, ऐसी रोशनी जिसमें हमारा अक्स दमकता है। ये अंधेरे की रोशनी, ये उजाला, जो बहुत शानदार है, जिसके पास जाने कितने रंग हैं, जिनमें हम सराबोर हो जाना चाहते हैं।
बोलो, दिन में कभी देखी है ये रोशनी?
नहीं न.. अरे ये दिन के उजाले छलावा करते हैं। डरते हैं ये कहीं हम हम न हो जाएं, कहीं हम इस दौड़ का हिस्सा बनने से इनकार न कर दें। कहीं सच मे मुस्कुराना न शुरू कर दें। डरते हैं उजाले दिन के कि कहीं हम खुद से न मिल लें।
रात काली जरूर है, पर छलती नहीं किसी को। बेपरवाह मिलने देती है ख़ुद से ख़ुद को। बातें करने देती है उस आवाज़ से जिसे दिन के उजालों में दबा के रखते हैं। सुकून की चादर बिछा के एक मखमली बिछौना देती है ये रात, हमारे सपनों को सहलाती है, छिपे हुए ज़ख्मों पे मरहम लगाती है, घण्टों हमसे बातें करती है। हमारे आँसुओं पे हंसती नहीं, रोती है बैठ सिरहाने पे।
पीछे छुटे सपनों की चुभन को हमारे साथ महसूस करती है। कल के दिन के लिए नए सपने नए हौसले देती है। बहुत क़ीमती है रात का साथ, आख़िर मिलना है न ख़ुद से।
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